भा० दि० जेनसंघ-यन्थमाला

इस ग्रन्थमालाका उद्देश्य

प्राकृत संस्कृत आदि में निबद्ध दि० जैनागम, दशन, साहित्य, पुराण आदिका यथासम्मव हिन्दी अनुबाद सहित प्रकाशन करना

सञ्चालक

भा० दि० जेनसंघ ग्रन्याह १-४

प्रासिस्थान

मैनेनर

भा० दि० जेन संघ 'चौरासी, मधुरा

मुद्रक-कन्द्रैयाढाढ, कैलाश प्रेस, बी० ७५९२ हाड़ाबाग ( सोनारपुर ) वाराणसी

है स्थापनाब्द ] प्रति ८०० [ बो० वि० सं० २४६८

Sri Dig. Jain Sangha Granthamala NO. $- IV

THIDI VIHATTI

BY GUNADHARACHARYA

WITH

CHURNI SUTRA OF YATIVRASHABHACHARYA.

AND THE JAYADHAVALA COMMENTARY OF VIRASENACHARYA THERE-UPON EDITED BY

Pandit Phulachandra Siddhantashastri,

EDITEOR MAHABANDHA JOINT EDITOR DHAVALA,

Pandit kailashachandra Siddhantashastri

Nyayatirtha, Sidhantaratna, Pradhanudhyapak, Syadvada Digambaro Jair Vidyalaya, Banaras,

PUBLISHED BY

THE SECRETARY PUBLICATION DEPARTMENT. THE ALL-INDIA DIGMBAR JAIN SANGHA | CHAURASI: MATHURA.

VIRA-SAMVAT 2483 ] VIKRAMS. 20I3 Ci956.A. ८,

Sri Dig. Jain Sangha Sranthamalla

Foundation year-—] [—Vira Niravan Samvat 2468

Ans of ihe Serles:—

Publication of Digambara Jain Siddhanta,

arsana, Purana, Sahitya and oiher Works

in Prakrit, Sanskrit etc, Possibly with Hind Commentary and Translation,

DIRECTOR SRI BHARATAVARSIYA DIGAMBARA JAIN SANGHA NO. [. VOL. W.

To be had from:—

THE MANAGER SFI I)IG. JAIN SANGHA CHAURASI MATHURA, U.P. (INDIA)

Printed by—Kanhiaya Lal " At The Kailash Press, B. 7/92 Hara Bagha SOnar fur Banaras

$00 Copies Price Rs. Twelve only

प्रकाशक की ओरसे

श्री कसायषाहुड (जयघवळाजी) के चोथे भाग स्थितिविभक्ति ओर पाँचवें भाग अनुभाग

विभक्तिका प्रकाशन एक साथ हो रहा है। इसका कारण यह है कि जिस प्रेसमें चौथा भाग

छापनेके लिए दिया था उस प्रेसने उसे छापनेमें आवश्यकतासे अधिक विलम्ब किया के पाँ हाँ

साथ ही शुरूके पाँच फर्मोंको दीमझ चाट गई तब वहाँ से काम उठाकर दूसरे प्रेसको दिया

गया। किन्तु शुरूके पाँच फर्माको छापकर देनेमें पहले प्रेसने पुनः अनावश्यक विलम्ब किया

इतनेमें तीसरे प्रेसने पाँचयाँ भाग छापकर दे दिया इस तरह ये दोनों भाग एक साथ प्रकाशित

हो रहे हैं। दीपावलीके पश्चात्‌ छठा और सातवाँ भाग भी प्रेसमें दिये जानेके लिये प्रायः तैयार हैं

इन सब भागोंका प्रकाशन संघके वर्तमान सभापति दानवीर सेठ भागचन्द जी डोंगर- गढ़की ओरसे हो रहा है सेठ साहब तथा उनकी धर्मपत्नी सेठानी नर्वेदाबाईजी बहुत ही धमंप्रमी और उदार हैं। आपके साहाय्यसे यह कार्य शीघ्र ही निर्विध्त पूर्ण होगा ऐसी आशा हे आपकी उदारता और धमंप्रेमकी सराहना करते हुए में आपको बहुत धन्यवाद देता हूँ

इस भागके सम्पादन आदिका भार श्री पं० फूलचन्द्रजी सिद्धान्तशाखीने बहन किया है, मेरा भो यथाशक्य सहयोग रहा है. में पंडितजीको भी एतदर्थ धन्यवाद देता हूँ अपने जन्मकालसे ही जयघवला कायोळय काशीके स्व० बा० छेदीलालजीके जिनमन्दिरके नीचेके भागमें स्थित हे ओर यह सब स्व० बाबू साहबके सुपुत्र बा? गनेसदासजी और सुपौत्र बा० साढिगरामजी तथा बा० ऋषभदासजीके सौजन्य और धमंप्रमका परिचायक है। अतः मैं आप सबका भी आमारी हूँ।

इस भागका बहुभाग “बम्बई प्रिन्टिग प्रेस” तथा अन्तके कुछ फर्म 'केछाश प्रेस में छपे हें दोनोंके स्वामी तथा कर्मचारो भी इस सहयोगके लिए धन्यवादके पात्र हें

जयधबंला कायोळ्य केलाशचन्द्र शास्त्री भदेनी, काशी... | संत्री, साहित्य विभाग दीपावली, २४८३ भा० दि० जैनसंध, मथुरा

विषय-परिचय

प्रस्तुत अधिकारका नाम स्थितिविमंक्ति है। कर्मका बन्ध होनेपर जितने कालतक उसका कर्मरूपसे अवस्थान रहता है उसे स्थिति कहते हैं। स्थिति दो प्रकार की होती है--एक बन्धके समय प्राप्त होनेवाली स्थिति और दूसरी संक्रमण, स्थितिकाण्डकधात और अभःस्थितिगलना आदि होकर प्रास होनेबाली स्थिति केवल बन्धसे प्राप्त होनेवाली स्थितिका विचार महाबन्धम किया है | मात्र उसका यहाँपर विचार नहीं किया गया है। यहाँ तो अन्धके समय जो स्थिति प्राप्त होती है उसका मी विचार किया गया है और बन्धके बाद अन्य कारणोंसे जो स्थिति प्रास होती है या शेष रहती है उसका भी विचार किया गया है। मोहनीय कर्मकी उत्तर प्रकृतियाँ अडाईस हैं। एक बार इन भेदोंका आश्रय लिए बिना और दूसरी बार इन भेदोंका आभय लेकर प्रस्तुत अधिकारमे विविध अनुयोगद्वारोका आश्रय लेकर स्थितिका सांगोपाँग विचार किया गया है वे अनुयोगद्वार ये है--अद्वाच्छेद, सर्वविभक्ति, नोसवविभक्ति, उत्कृष्ट विभक्ति, अनुत्कृष्टविभक्ति, जधन्य- विभक्ति, अजधन्यविभक्ति, सादिविभक्ति, अनादिविभक्ति, भ्रुवविभक्ति, अश्रुवविभक्ति) एक जीवकी अपेक्षा स्वामित्व, काळ, अन्तर) नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय, परिमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, काळ, अन्तर, सन्निकष भाव और अल्पबहुत्व मूल्प्रकृति स्थितिविभक्ति एक है, इसलिए उसमें सन्निकर्ष अनुयोगद्वार सम्भव नहीं है, इसलिए, इस अधिकारको उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा ही जानना चाहिए, अद्भाच्छेद--अडा शब्द स्थितिके अर्थमें काळवाची है। तदनुसार अद्वाच्छेदका अर्थ कालविभाग होता है। यह जघन्य ओर उत्कृष्ट मेदसे दो प्रकारका है। मोहनीय सामान्यका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सत्तर कोडाकोडी सागरप्रमाण होता है यह विदित है, इसलिए मोहनीय सामान्यका उत्कृष्ट अद्ाच्छेद उक्तप्रमाण कहा हे | इसमें सात हजार वष आबाधाकालके भी सम्मिलित हैं, क्योंकि ऐसा नियम है कि कर्मका बन्ध होते समय स्थितिबन्धके अनुसार उसकी आबाधा पड़ती हे यदि अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरके भीतर स्थितिबन्ध होता है तो अन्तमुहूत प्रमाण आबाधा पड़ती है और सौ कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण स्थितिबन्ध होता है तो सो वर्षप्रमाण आबाधा पड़ती है। आगे इसी अनुपातसे आबाधाकाल बढ्ता जाता है, इसलिए सत्तर कोडाकोडी सागरप्रमाण स्थितिबन्धके होने पर उसका आबाधाकाल सात हार वर्षप्रमाण बतलाया है विशेष खुलासा इस प्रकार हे--किसी भी कर्मका बन्ध होने पर वह अपनी स्थितिके सब समयोंमें विभाजित हो जाता हे मात्र बन्ध समयसे लेकर प्रारम्भके कुछ समय ऐसे होते हैं जिनमें कर्मपुब्ज नहीं प्राप्त होता जिन समयोंमें कमपुंज नहीं प्राप्त होता उन्हें आधाधा काळ कहते हैं। इस आधाधाकाछको छोड़कर स्थितिके शेष समयोंमें उत्तरोत्तर विशेष हीन क्रमसे कर्मपुञ्ज विभाजित होकर मिलता है। उदाहरणार्थ मोहनीयकर्मका सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण स्थितिबन्ध होने पर बन्ध समयसे लेकर सात हजार वर्ष तक सब समय खाली रहते हैं | उसके बाद अगले समयसे लेकर सत्तर कोड़ाकीड़ो सागर तकके कालके जितने समय होते हैं, विवक्षित मोहनीयकर्मके उतने विभाग होकर सात हजार वर्षके बाद, प्रथम समयके बटवारेमें जो भाग आता है वह सबसे बड़ा होता है, उससे अगले समयके बटवारेमें जो भाग आता है वह उससे कुछ हीन होता हे इसी प्रकार सत्तर कोडाकोडी सागरके अन्तिम समय तक जानना नाहिए यहाँ इतना बिशेष जानना चाहिए कि यहाँ पर मोइनीयकी जो उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर कही है वह सत्तर कोडाकोडी सागरके अन्तिम समयके बढ्वारेमे प्रात होनेवाले द्रव्यको अषेक्षासे कही है वस्तुतः आबाधाकालछके बाद जिस समयके बटवारेमे जो द्रव्य आता हे उसकी उतनी ही स्थिति जाननी चाहिए स्थितिके अनुसार बटवारेका यह क्रम सवत्र जानना चाहिए इस प्रकार मोइनीय कर्मके उत्कृष्ट अद्वाच्छेदका विचार किया मोहनोय- 'कमका जघन्य अद्धाच्छेद एक समयप्रमाण है। यह क्षपक सूक्ष्मसाम्परायिक जीवके अन्तिम समयमें सुक्ष्म- लोमकी उदयस्थितिके समय प्रात होता है। मोहनीयकी उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिध्यात्वका उत्कृष्ट 'अद्वाच्छेद मोहनीय सामान्यके समान सत्तर कोडाकोडी सागर हे तथा सम्यक और सम्यग्मिथ्यात्वका

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उत्कृष्ट अद्वाच्छेद अन्तमुहत कम सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर है, क्योंकि ये दोनों बन्ध प्रकृतियाँ होकर संक्रम प्रकृतियाँ हे, इसलिए जिस जीवने मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करके उसका काण्डकधात किये बिना अन्तमुहूते कालके भीतर वेदकसम्वक्त्वको प्रास किया हे उसके वेदकसम्यक्त्वको प्रास करनेके प्रथम समयमें अन्तर्मुहर्त कम मिथ्यात्वके सब निषेकोंका कुछ द्रव्य संक्रमणके नियमानुसार सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्व रूपसे संक्रमित हो जाता है, इसलिए इन दो प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अद्ाच्छेद अन्तमुहूत कम सत्तर कोडाकोड़ी सागरप्रमाण पास होता है। सोलह कघायोंका उत्कृष्ट अदाच्छेद चालीस कोडाकोड़ी सागरप्रमाण है, क्योंकि संडी पञ्चेन्द्रिय पर्या जीवके इन कर्मोंका इतना उत्कृष्ट स्थितिवन्ध होता है नो नोकषायोंका उत्कृष्ट अद्वाच्छेद एक आवलि कम चालीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण हे यद्यपि नौ नोकषाब बन्ध प्रकृतियां हैं पर बन्धसे इनकी उक्त प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति नहीं प्रास होती किन्तु यह उत्कृष्ट अद्धाच्छेद संक्रमणसे प्राप्त होता है यहां इतना विशेष जानना चाहिए कि जब सोलह कषायोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होता है तब नपुंसकवेद्‌, अरति, शोक, भय और जुगुप्साका नियमसे बन्ध होता है उस समय स्रीवेद, पुरुषवेद्‌, हास्य और रतिका बन्ध नहीं होता इसलिए नपुंसकवेद आदि पाँच प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अद्धाच्छेद सोलह कघायोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धके समय भी सम्भव है, क्योंकि मान ळीजिए किसी जीवने सोलह कषायोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध प्रारम्भ किया और उस समय वह नपुंसकवेद आदिका भी बन्ध कर रहा हे, इसलिए वह जीव एक आवलिके बाद सोलह कषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिको नपुंसकवेद आदिमें संक्रमित भी करने लगेगा अतः सोलह कषायोंके बन्धकालके भीतर ही नपुंसकवेद आदिका उत्कृष्ट अद्वा- च्लरुद बन जायगा पर स्त्रीवेद आदिका उस समय तो बन्घ होता ही नहीं, इसलिए सोल कधायोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध कराकर और उससे निवृत्त होकर स्रीवेर आदि चारका बन्ध करावे और एक आवलि कम सोलह कषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रमण कराके इनका उत्कृष्ट अद्वाच्छेद आवलि कम चालीस कोड़ाकोड़ी सागर- प्रमाण प्राप्त करे ख्रीवेद आदि चार प्रकृतियोंकी कहीं कहीं पुण्य प्रकृतियोंके साथ परिगणना की जाती है इसका बीज मही हे यह उत्कृष्ट अद्धाच्छेद हे इन प्रकृतियोंके जघन्य अडाच्छेदका विचार करने पर मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और बारह कषाय ये स्वोदयसे क्षय होनेवाली प्रकृतियां नहीं हैं, इसलिए नब इनकी अपनी अपनी क्षपणाके अन्तिम समयमें दो समय कालवाली एक निषेकस्यिति शेष रहती हे तन इनका जघन्म अद्धाच्छरेद होता दै सम्य और लोभसंज्वलन इनका तो नियमसे स्वोदयसे ही क्षय होता हे तथा स्त्रीवेद और नपुंसकवेद ये भी स्वोदयसे क्षयको प्राप्त हो सकती हैं, अतः जज इनकी क्षपणाके अन्तिम समथमें एक समय कालवाली एक निषेकस्थिति रोष रहती है तन इनका जघन्य अद्धाच्छेद होता है एक तो क्रोधसंज्बलन, मानसंज्वलन, मायासंज्वलन और पुरुषवेद इनका क्षपकश्रेणिमं अपनी अपनी उदयन्युच्छित्तिके अन्तिम समबमें पूरा सत्तनाश नहीं होता। दूसरे वहाँ इनके अपने अपने वेदनकाळके अन्तिम समयमे नवकबन्धके निषेकोंके साथ प्रथम स्थितिके निषेक भी शेष रहते हैं, इसलिए इनकी जघन्य स्थिति अपने अपने वेदनकालके अन्तिम समयमे कहकर अन्तमें जो नूतन बन्ध होता हे उसके एक समय कम दो आवशिप्रमाण गला देने पर अन्तमें इन कर्मों की जघन्य स्थिति कही हे जो क्रोधसंज्वळनकी अन्तर्मुहत॑ कम दो महीना, मानसंज्वळन की अन्तमुहूत कम एक महीना, मायासंज्वलनकी अन्तमुहूत कम पन्द्रह दिन और पुरुषवेदकी अन्तमुंहूते कम आठ वष्प्रमाण होती है यही इनका जघन्य अदाच्छेद है छह नोकषायोंके अन्तिम काण्डककी अन्तिम फाळि संख्यात वर्षप्रमाण होती है, इसलिए इसका जघन्य अद्धाच्छेद संख्यात ` वर्षप्रमाण कहा है

सर्व-नोसवबिभक्ति--सर्वस्थितिविभक्तिमें सब स्थितियां और नोसधस्थितिषिमक्तिमें उनसे न्यून स्थितियाँ बिवक्षित हें मूल ओर उत्तर प्रकृतियोंमें यह यथायोग्य घटित कर लेना चाहिए.

उत्कृष्ट-अनुत्कृष्टबिभक्ति--सवसे उत्कृष्टस्थिति उक्कष्ट स्थितिविभक्ति है और उससे न्यून स्थिति अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति है ओघ और आदेशसे नहाँ यह थिसप्रकार सम्भब हो. उस प्रकारे उसे जान लेना चाहिए

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जघन्य-अजघन्यविभक्ति--सत्रसे जघन्य स्थिति जघन्य स्थितिविभक्ति है और उससे अधिक स्थिति अजघन्य स्थितिविभक्ति है | मूल और उत्तर प्रकृतियोंमें इस बीजपदके अनुसार घटित कर लेना चाहिए

सादि-अनादि-धव-अध्र्वावभक्ति--सामान्यसे मोहनीयकी जधन्य स्थिति क्षपक सूक्ष्मसाम्परायिक जीवके अन्तिम समयमें होती है, अतः जघन्य स्थितिविभक्ति सादि और अग्रुव है इसके पूव अजघन्य स्थितिविभक्ति होती है, इसलिए वह अनादि तो है ही साथ ही वह अभव्यों की अपेक्षा ध्रुव और भव्योंकी अपेक्षा अध्रव भी है तथा उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति कादाचित्क होती है इसलिए वे सादि और अप्रव हें उत्तर ग्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्व, बारह कषाय और नो नोकघायॉके विषयमे इसीप्रकार जानना चाहिए अर्थात्‌ इनकी उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य स्थितिविमक्ति सादि और अध्व होती है तथा अजधन्य स्थितिविभक्ति सादि विकल्पको छोइकर तीन प्रकारकी होती हे कारण स्पष्ट हे सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्व ये दो प्रकृतियाँ ही सादि हैं, इसलिए इनकी उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य ये चारों स्थितिविभक्तियाँ सादि और अध्रव होती हैं अब रही आनन्तानुबन्धीचतुष्क सो इसकी उत्कृष्ट और अनुक्कृष्ट स्थितिविभक्तियाँ कादाचित्क होनेसे सादि और अध्रुव हैं तथा जघन्य स्थितिविभक्ति विसंयोजनाके वाद इसकी संयोजना दोनेके प्रथम ।समयमें ही होती है, इसलिए वह भी सादि और अश्रव है किन्तु अजघन्य स्थितिविभक्ति विसंयोजनाके पूव अनादिसे रहती है तथा विसंयोजना के बाद पुनः संबोजना होनेपर भी होती है, इसलिए तो वह अनादि और सादि है। तथा अभव्योंकी अपेक्षा भ्रव और भव्योंकी अपेक्षा अश्रुव भो है इसप्रकार अनन्तानुमन्धीचतुष्ककी अजघन्य स्थितिविभक्ति सादि आदिके भेदसे चारों प्रकारकी है यह ओघ प्ररूपणा है मागणाओंमें अपनी अपनी विरोषताको जानकर योजना करनी चाहिए

स्वामिस्व--सामान्यसे मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्न करनेवाला जोव उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका स्वामी है अवान्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्व और सोलह कषायोंके विषयमें इसी प्रकार स्वामित्व जानना चाहिए यद्यपि यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करके द्वितीयादि समयोंमें अनुत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करनेवालेके उत्कृष्ट स्थितिका एक भी निषेक नहीं गलता, इसलिए केवल बन्धके समय उत्कृष्ट स्थिति मानकर अन्य समयोंमें भो उत्कृष्ट स्थिति मानी जानी चाहिए पर यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट स्थिति कालप्रधान होती है और द्वितीयादि समयोंमें अधःस्थिति गलनाके द्वारा एक एक समय कम होता जाता है, इसलिए उत्कृष्ट स्थितिबन्धके समय ही उत्कृष्ट स्थितिविमक्ति मानी गई है। सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका ऐसा प्रथम समयवर्ती वेदकसम्यग्हष्टि जीव स्वामी है जिसने मिथ्यात्व शुणस्थानमें मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध कर अत्तमुहूर्तमें वेदकसम्यक्त्व प्राप्त किया है। तथा कषायोंकी उत्कृष्ट स्थिति बाँधकर जो एक आवलिकालके बाद उसे नो नोकघायोंमे संक्रान्त कर रहा है वह नो नोकषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका स्वामी हे सामान्यसे' मोहनीयकी जघन्य स्थितिविभक्ति क्षपक सूक्ष्मसाग्परायके अन्तिम समयमे होती है, इसलिए वह इसका स्वामी है उत्तर- प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्वकी क्षपणा करनेवाला जीव उसकी क्षपणाके अन्तिम समयमें उसकी जघन्य स्थिति- विभक्तिका स्वामी हे। इसी प्रकार सम्यक्त्व) सम्यग्मिध्यात्व) सोलह कषाय और छह नोकषायकी ' जघन्य स्थितिविभक्तिका स्वामी अपनी अपनी क्षपणाके अन्तिम समयवर्ती जीवको जानना चाहिए मात्र सम्यग्मिथ्यात्वका यह जघन्य स्वामित्व अपनी उद्देलनाके अन्तिम समयमे भी बन जाता है। तथा तीन वेदकी जघन्य स्थितिविभक्तिका स्वामी स्वोदयसे क्षपकश्रेणि पर चढ़ा हुआ अन्तिम समयवर्ती जीव हे यह ओघसे स्वामित्व कहा है। मार्गणाओमें अपनी अपनी विशेषता जानकर यह स्वामित्व घटित कर लेना चाहिए जहाँ जिन प्रकृतियोंकी क्षपणा सम्भव हो वहाँ उसका विचार कर और जहाँ क्षपणा सम्भव हो वहाँ अन्य प्रकारसे जघन्य स्वामित्व घटित करना चाहिए तथा उत्कृष्ट स्वामित्वमे भी अपनी अपनी विशेषताको जानकर वह ले आना चाहिए

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काछ--उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक अन्तमुंहूर्त काळ तक होता है, इसलिए सामान्यसे मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका जघन्य काल एक समय ओर उत्कृष्ट काळ अन्तमंहूर्त है एक बार उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध होकर पुनः उत्कृष्ट स्थितिका वन्ध होनेमें कमसे कम अन्त्सुहूतं काळ लगता है और यदि कोई जीव उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करके एकेन्द्रियादि पर्यांयोमें परि- भ्रमण करने लगे तो उसके अनन्त काळ तक उत्कृष्ट स्थितिका अन्व नहीं होगा, इसलिए यहां अनुत्क स्थितिविभक्तिका अधन्य और उत्कृष्ट काळ उक्तप्रमाण जानना चाहिए नौ नोकषायोंमें नपुंसकवेद अरति, शोक, भय और जुगुप्साका बन्ध सोलह कषायोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धके साथ मो सम्भव है और इसलिए, इनकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका जघन्य काळ एक समय और उत्कृष्ट काळ अन्तमुह्रत बन जाता हे पर शेष चार नोकषायोंका बन्ध सोलह कषायोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धदे समय सम्मव नहीं है, इसलिए इनकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका जघन्य काल एक समव और उत्कृष्ट काल एक आवलिप्रमाण है। तथा इन नो नोकषायोकी अनुत्कृष्ट स्थिति- विभक्तिका जघन्य काल एक समय है, क्योंकि कोधादि कषायोंकी एक समयके अन्तरसे एक समय आदि कम अनुत्कृष्ट स्थितिका बन्ध कर एक आवलिके बाद उसका उसी क्रमसे नौ नोकषायोंमें संक्रमण करने पर इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय उपलब्ध होता है। तथा उत्कृष्ट काल सोलह कषायोंके समान अनन्त काल है यह स्पष्ट ही है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी त्कृष्ट स्थितिविभक्ति जो मोहनोयको उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करनेवाला जीव अन्तमुंहूर्तमें वेदकसम्यक्त्वको प्रास होता है उसके प्रथम समयमें होती हे, इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है तथा जो जीव उपशमसम्यक्त्वके साथ इन दोनों प्रकृतियोंकी सत्ता प्रास कर अन्तर्मुहुतेमें क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाता हे उसके इनकी अनुत्कृष्ठ स्थिति- विभक्तिका जघन्य काळ अन्तसुहूते देखा जाता है और जो बीचमें सम्यग्मिध्यात्वके साय दो छ्यासठ सागर कालतक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहता है उसके साधिक दो छयासठ सागर कालतक इनकी अनुत्कृष्ट स्थिति- विभक्ति देखी जाती है, इसलिए इनकी अनुत्कृष्टस्थितिका जधन्य और उत्कृष्ट काल उक्तप्रमाण कहा है सामान्यसे मोहनीयकी जघन्य स्थिति क्षपक सूक्ष्मसाम्परायके अन्तिम समयमें होती हे इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है तथा अजधन्य स्थितिविभक्ति अभव्योंकी अपेक्षा अनादि अनन्त और भव्योंकी अपेक्षा अनादि-सान्त है। उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा छइ नोकषायोंके सिवा शेष सब' प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय हे मिथ्यात्व नारह कषाय और तीन वेदकी अजघन्य स्थितिबिभक्तिका काल अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त है, क्योंकि इनकी जघन्य स्थिति क्षपणाके अन्तिम समयमें होती है, इसलिए यह काळ बन लाता है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वकी जघन्य स्थिति मी अपनी अपनी क्षपणाके अन्तिम समयमें होती हे, इसलिए इनकी अजघन्य स्थितिका जघन्य काळ अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल साधिक दो छथासउ सागर प्रमाण हे कारण का निर्देश पहले कर ही आये हैं। अनन्तानुबन्धी विसंयोजना प्रकृति है इसलिए इसकी अबघन्य स्थितिके अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त और सादि-सान्त ये तीन विकल्प बन जाते हैं उनमें सादि-सान्त अजघन्य स्थितिका जघन्य काल अन्तर्मुहत है, क्योंकि संयोजना होने पर पुनः अन्तमुहूतमें इसकी विसंयोजना हो सकती है और उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्षपुद्गळ परिवतनप्रमाण है, क्योंकि विसंयोजनाके बाद संयोजना होने पर इतने काल तक जीव इसकी विसंयोजना करे यह सम्भव हे छह नोकघायोंकी जघन्य स्थिति अन्तिम स्थिति- काण्डकके पत नके समय होती है और उसमें अन्त्मुहूतं काल लगता है, इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तसुंहूते कहा है तथा अजघन्य स्थिति इसके पहले सर्वदा बनी रहती है और अभव्योके इनका कभी अभाव नहीं होता, इसलिए इनकी अजघन्य स्थितिका काल अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त कहा है गति आदि मार्गणाओंमें इसी प्रकार अपनी अपनो विशेषता जानकर यह काल घटित कर लेना चाहिए |

` अन्तर--सामान्यसे मोइनीयका एक बार उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होकर पुनः वह अन्तमुहूतके बाद हो सकता है और एकेन्द्रियादि पर्यायोंमें परिभ्रमण करता रहे तो अनन्तकाळके अन्तरसे होता है, इसलिए इसकी

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उत्कष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तमुहत और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है। तथा इसकी अनुल्कृष्ट स्थिति कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तर्महूतके अन्तरसे होती है, क्योंकि इसकी उत्कृष्ट स्थितिचन्धका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काळ अन्तसुहूत है, इसलिए इसकी अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुंहूर्त कहा हे उचर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्व और बारह कषायोंकी उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिका इसी प्रकार अन्तर काळ जानना चाहिए सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहृर्तके अन्तरसे भी हो सकती है और उपार्घ पुद्गळ परिवर्तनके अन्तरसे भी हो सकती है, इसलिए इनकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर अन्त्ुहूत और उत्कृष्ट अन्तर उपार्ध- पुद्गल परिवतनप्रमाण कहा है। तथा इनकी उत्कृष्ट स्थितिका काल एक समथ होनेसे इनकी अनुत्कृष् स्थितिका अन्तर एक समय होता है और जो जीव अर्थपुद्गछ परिवर्तनके प्रारम्भमें और अन्तमें इनकी सचा प्रास कर मध्यके उपार्धपुद्दळपरिवर्तन काळ तक इनकी सत्तासे रहित होता है उसके उपार्धपुद्गळपरिवतन- प्रमाण अन्तर हो सकता है, इसलिए अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर उक्तप्रमाण कहा हे अनन्तानु- बन्धोचतुष्ककी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर तथा अनुत्कृष्ट स्थितिका जपन्य अन्तर एक समय मिथ्यात्वके समान घटित कर लेना चाहिए। तथा जो वेदकसम्यग्दष्टे इनकी विसंयोजना कर मध्यमें सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त होकर कुछ कम दो छयासठ सागर काल तक इनके बिना रहता है उसके इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका उक्त अन्तर देखा जाता है, इसलिए इनकी. अनुत्कृष्ट स्थितिका कुछ कम दो छ्यासठ सागरप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर कहा है नौ नोकधायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर तथा अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर मिथ्यात्वके समान ही है मात्र इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिके उत्कृष्ट अन्तरमें मेद है बात यह है कि पाँच नोकधायोंका स्थितिबन्ध सोलह कघायोंके उत्कृष्ट स्थितिमन्धके समय भी सम्भव है, इसलिए नको अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर तो अन्तसुहूर्त बन जाता है पर चार नोकघायोंका बन्ध सोलह कषायोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धके समय सम्भव नहीं है, इसलिए इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर एक आवलि प्राप्त होता है जघन्यकी अपेक्षा मोहनीय सामान्यकी जघन्य स्थिति क्षपकश्रेणिके अन्तिम समयमें प्राप्त होती है, इसलिए इसकी जघन्य और अजधन्य स्थितिका अन्तर काळ नहीं हे इसी प्रकार मिथ्यात्व बारह कषाय ओर नो नोकघायोंकी जधन्य और अजघन्य स्थितिका अन्तर काल नहीं है।

सम्यक्त्वकी जघन्य स्थितिका भी अन्तर काळ नहीं है इसकी अजघन्य स्थितिका अन्तर अनुत्कृष्टके समान है सम्यग्मिध्यात्बकी जघन्य स्थिति उद्देलनाके समय और क्षपणाके समय होती है, इसलिए इसकी जघन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तसुंहूते कहा है, क्योंकि जो जीव इसकी उद्वेलना करके और दूसरे समयमें सम्यक्त्वके साथ पुनः इसकी सत्ता प्राप्त कर अन्तमुहूतमें इसकी क्षपणा करता है उसके यह अन्तर- काल बन जाता है तथा इसका उत्कृष्ट अन्तर उपाधपुद्गल परिवर्तेन प्रमाण है, क्योंकि जो उपार्धं पुद्गल परिवर्तनके प्रारम्ममें इसकी सत्ता प्रास करके मध्य कालमें इसकी सचासे रहित रहता है और उपार्घ पुद्गल परिवर्तनके अन्तमें पुनः इसकी सत्ता प्राप्त कर क्षपणा करता हे उसके इसकी जघन्य स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर उपाधपुद्गल परिवर्तेनप्रमाण देखा जाता हे इसकी अजघन्य स्थितिका अन्तर अनुत्कृष्टके समान है यह स्पष्ट ही है अनन्तानुबन्धी विसंयोजना प्रकृति है, इसकिए इसकी जघन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तमुहूत और उत्कृष्ट अन्तर उपार्धं पुद्गरपरिवतन प्रमाण प्रास हो जाता है इसलिए वह उक्त प्रमाण कहा है तथा इसकी विसंयोजना होकर कम से कम अन्तमुहूत

काळ तक और अघिकसे अधिक कुछ कम दो छथासठ सागर काळ तक इसका अभाव रहता हे, इसलिए

इसकी अजधन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तमुंहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण

है fn आदि मार्गणाओंमें अपने अपने स्वामित्वको जानकर इसी प्रकार यह अन्तरकाळ घटित कर [ चाहिए

भगवि चय--जो उत्कृष्ट स्थितिवाले होते हैं वे अनुत्कृष्ट स्थितिवाले नहीं होते और जो अनुत्कृष्ट स्थितिवाले होते हैं वे उत्कृष्ट स्थितिवाले नहीं होते। इसी प्रकार जघन्य और अजन्य स्थितिकी अपेक्षा

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भी यह भर्थपद जानना चाहिए इस अर्थपदके अनुसार ? कदाचित्‌ सत्र जीव मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिसे रहित हैं; कदाचित्‌ बहुत जीव मोहनीयको उत्कृष्ट स्थितिसें रहित है और एक जीव उत्कृष्ट स्थितिवाळा है, कदाचित्‌ बहुत जीव मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थिविसे रहित हैं और बहुत जीव उत्कृष्ट स्थितिवाले हैं ये तीन भङ्ग होते हैं। अनुत्कृ2 स्थितिकी अपेक्षा कदाचित्‌ सत्र जीव मोहनीय- की अनुत्कृष्ट स्थितिवाले दै, कदाचित्‌ बहुत जीव मोहनोयकी अनुत्क स्थितिवाले हैं और एक जीव अनुत्कृष्ट स्थितिसे रहित हे, कदाचित्‌ बहुत जीव मोहनीयकी अनुक्कष्ट स्थितिवाले हैं और बहुत जोव अनुत्कृष्ट स्थितिसे रहित हैं ये तीन भंग होते हैं। उत्तर २८ प्रकृतियोंकी अपेक्षा ये ही भङ्ग जानने चाहिए मोइनीय सामान्य की जबन्य और अजघन्य स्थितिकी अपेक्षा भी जो उत्कृष्ट और अनुत्कृश स्थितिकी अपेक्षा तीन तीन भङ्ग कहे हैं उसी प्रकार तीन तीन भंग जानने चाहिए २८ उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा भी इसी प्रकार मङ्ग घटित कर लेने चाहिए तात्पर्य यह है कि जो उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा तीन भज्ञ कहे हैं वे सर्वत्र जघन्य स्थितिकी अपेक्षा तीन भङ्ग जानने चाहिए और जो अनुत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा तीन भङ्ग कहे हैं वे सर्वत्र अजघन्य स्थितिकी अपेक्षा तीन भङ्ग जानने चाहिए गति आदि मार्गणाओंमें मी अपनी अपनी विशेषताको जानकर ये मङ्ग ले आने चाहिए भागाभाग--मोहनीय साम/न्यकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव अनन्तवें भागप्रमाण हैं और अनुत्कृष्ट स्थितिवाले जीव अनन्त बहुभागप्रमाण हैं। इसी प्रकार मोहनीयकी छब्जीस उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा भागाभाग जानना चाहिए सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव असंख्यातवे मागप्रमाण हैं और अनुकृष्ट स्थितिवाले जीव असंख्यात बहुमागप्रमाण हैं मोहनीय सामान्य और उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा जघन्य और अजघन्य स्थितिवालोंका इसी प्रकार भागाभाग हे अर्थात्‌ जघन्य स्थिति वाले अनन्तवे भागप्रमाण हैं. और अजघन्य स्थितिवाले अनन्त बहुभागप्रमाण हैं। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अपेक्षा जघन्य स्थितिवाले जीव असंख्यातवें भागप्रमाण हैं और अजघन्य स्थितिवाले जीव

असंख्यात अहुमागप्रमाण हैं। गति आदिं मागणाओंमें अपनी अपनी संख्या आदिको जानकर यह मागामाग घटित कर लेना चाहिए |

परिमाण --मोहनीय सामान्यकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव असंख्यात हैं और अनुत्कृष्ट स्थितिवाले जीव अनन्त हैं इसी प्रकार छब्बीस उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षासे यह परिमाण जानना चाहिए सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिवाले जीव असंख्यात हैं मोइनीय सामान्यको अपेक्षा जघन्य स्थितिवाले जीव संख्यात और अजघन्य स्थितिवाले जीव अनन्त हैं छब्बीस उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा इसी प्रकार परिमाण जानना चाहिए सम्यक्त्वकी अपेक्षा जघन्य स्थितिवाले जीव संख्यात हैं और अजघन्य स्थितिवाले जीव असंख्यात हैं। तथा सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य और अजघन्य स्थितिवाले जीव

re हैं। गति आदि मागंणाओंमें अपने अपने परिमाणको और स्वामित्वको जानकर यह घटित कर ना चाहिए

क्षेत्र-मोहनीयकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिवालोंका क्षेत्र छोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है ओर अनुत्कृष्ट अजघन्य स्थितिवालोंका क्षेत्र सर्व लोकप्रमाण है मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी अपेक्षा इसी प्रकार क्षेत्र जानना चाहिए सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिथ्यात्वको अपेक्षा उत्कृष्ट; अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य स्थितिवालोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है। गति आदि मार्गणाओंमें अपने अपने स्वामित्वको क्षेत्रको जानकर यह घटित कर लेना चाहिए

स्पशंन--मोहनीय सामान्यकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवालोंका वतमान स्पशन छोकके असंख्यातव भागप्रमाण, विद्वारादिकी अपेक्षा अतीत स्पर्शन त्रसनाछीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण और मारणान्तिक पदकी अपेक्षा ्सनाछीके कुछ कम तेरह बरे चौदह भागप्रमाण हे तथा अनुत्कृष्ट स्थितिवालोंका सर्वे लोकप्रमाण स्पर्शन है उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्व, सोलइ कषाय और नो नोकघायोंकी उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिवाळॉका यही स्पर्शन है इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी उत्कृष्ट स्थिति-

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बालोंका यह स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह मागप्रमाण है तथा अन्य आचायों के अभिप्रायसे यह त्रसनालोके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण है कारणका निर्देश १४ ३६८ के विशेषार्थमें किया है। सम्यक्त्व और सम्पग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थिति वेदकसम्यक्त्वकी ग्रातिके प्रथम समयमें सम्भव है और ऐसे जीवोंका स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण है, इसलिए यह स्पशन उक्त प्रमाण कहा है। इस अपेक्षासे वर्तमान स्पर्रान छोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है यह स्पष्ट ही है। इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिवालोंका उत्कृष्ट के समान स्पर्शन तो बन ही जाता है। साथ ही मारणान्तिक और उपपादकी अपेक्षा सर्वलोक प्रमाण स्पर्शन भी बन जाता है इसलिए यह उक्तप्रमाण कहा है मोहनीयकी जघन्य स्थिति क्षपकश्रेणिमें प्रात होती है, इसलिए इसकी जघन्य स्थितिवालोका छोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पशन है और मोहनीयकी रुत्तावाले जीव सर्व छोकमें पाये जाते हैं, इसलिए इसकी अजघन्य स्थितिवालोंका सवलोक प्रमाण स्पशन कहा है उत्तर प्रकृतियोंमें मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी अपेक्षा इसी प्रकार स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए सम्यक्त्वकी जघन्य स्थितिवालोंका सर्शन क्षेत्रके समान और अजघन्य स्थितिवालोंका स्पर्शन अपने अनुत्कृष्टके समान है यह स्पष्ट ही है। तथा सम्यम्मिध्यात्वके जघन्य और अजघन्य स्थितिवालोंका स्पशन अनुत्कृष्टके समान है यह भी स्पष्ट है अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी जघन्य स्थिति देवोंके विहारादिके समय भो सम्भव है इसलिए इसवाले जीवोंका स्पशन वर्तमानकी अपेक्षा छोकके असंख्यातव भागप्रमाण और अतीतकी भपेक्षा त्रसनाळीके कुछ कम आठ बटे चौदह मागप्रमाण कहा हे इसके

अजघन्य स्थितिवालोंका स्पशन सवलोकप्रमाण है यह स्पष्ट ही है। गति आदि मार्गणाओंमें अपनी अपनी विशेषताको जानकर इसो प्रकार स्परान घटित कर लेना चाहिए

काळ--नाना जीव मोइनोयकी उत्कृष्ट स्थितिका एक समय बन्ध करके दूसरे समयमै कर यह सम्भव है और अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण काळ तक करते रहें यह भी सम्मव हे, इसलिए, मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवे भाग- प्रमाण कहा है तथा इसकी अनुत्कृष्ट स्थितिका काल सर्वदा है यह स्पष्ट ही है मोहनीयकी छन्त्रीस उन्तर- प्रकृतियोंकी अपेक्षा यह काळ इसी प्रकार जानना चाहिए मात्र सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिश्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवे भागप्रमाण है, क्योंकि मोहनीय- की उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यात भागप्रमाण काल तक वेदकसम्यक्त्वको प्रास होते हैं तथा इनको अनुत्कृष्ट स्थितिवाडोंका काळ सवदा है यह स्पष्ट ही है मोहनीयकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काळ संख्यात समय है, क्योंकि क्षपकश्रेणिकी प्रातिका जघन्य काळ एक समय और उत्कृष्ट काळ संख्यात समय हे तथा इसकी अजघन्य स्थितिवालोंका काळ सवदा है मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, बारह कषाय और तीन वेदवाले जीवोंका यह काल इसी प्रकार है सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्क को जघन्य स्थितिवारलोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातब भागप्रमाण है कारण स्पष्ट हे। इनकी अजधन्य स्थितिवालोंका काळ सवदा है छह नोकघायोंकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुंहत हे, क्योकि एक स्थितिकाण्डकधातमें इतना काळ लगता है और उत्कृष्ट काल सवंदा है गति आदि मार्गणाओंमें अपनी-अपनी विशेषता जानकर यह काळ घटित कर लेना चाहिए अन्तर--मोइनीय सामान्य ओर अद्टाईस उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवाछोंका जघन्य अन्तर एक समय है, क्योंकि एक समय के अन्तरसे उत्कृष्ट स्थितिको प्राप्ति सम्भव है और उत्कृष्ट अन्तर अंगुलके असंख्यातवे भागग्रमाण है, क्योंकि उत्कृष्ट स्थितिबन्धके बाद उसका पुनः बन्ध होनेमें अधिकसे अधिक इतना अन्तरकाल प्राप्त होता है इनकी अनुक्कृष्ट स्थितिवालोंका अन्तरकाल नहीं है यह स्पष्ट ही है मोहनोयको जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है। अजघन्य स्थितिवालोंका अन्तरकाल नहीं हे मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आठ कषाय और छह नोकधायोंकी अपेक्षा यह अन्तरकाल इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुनन्धीचतुष्ककी जघन्य स्थिति-

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बालोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक चौबीस दिन-रात है, क्योंकि सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाळोंका और सम्यक्त्वसे मिथ्यात्वमें जानेवाले जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर साथिक चौबीस दिन-रात है, इसलिए, यह उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है तीन संज्वलन और पुरुषवेदकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक वर्ष है, क्योंकि इन प्रक्ृतियोंके उद्यसे इतने काळके अन्तरसे क्षपकश्रेणिपर आरोहण करना सम्भव है लोमसंज्बलनकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है, क्योंकि क्षपकभ्रेणिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है स्रीवेद और नपुं सकवेदकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर संख्यात वर्ष है, क्योंकि इन वेदवालोंका इतने कालके अन्तरसे क्षपकश्रेणि पर आरोहण करना सम्भव है इन सब प्रकृतियोंकी अनघन्य स्थितिवालोंका अन्तर काल नहीं है यह स्पष्ट ही है गति आदि मागणाओं

मं अपनो अपनी विशेषता जानकर यह अन्तरकाळ ले आना चाहिए

सन्निकर्ष--मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीवके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ता होती भी है और नहीं मी होती यदि अनादि मिथ्यादष्टि जीव हैं या जिन्होंने इन दोनोंकी उद्देलना कर दी है उनके सत्ता नहीं होती, शेष जीवोंके होती है | जिनके सत्ता होती है उनकी इनकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट शेती है, क्योंकि मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थिति मिथ्यात्व गुणव्यानमें होती है और इनकी उत्कृष्ट स्थिति वेदकसम्यक्त्वकी प्रातिके प्रथम समयमै होती है, इसलिए मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीवके इन दोनोंकी उत्कृष्ट स्थितिका निषेध किया है | इनकी अनुत्कृष्ट स्थिति भी अन्तर्ुहूते कम अपनी उत्कृष्ट स्थितिसे लेकर एक _ स्थितिपर्यन्त होती है कारण स्पष्ट है इतनी विशेषता है कि अन्तिम जघन्य उद्देळनाकाण्डककी अन्तिम फालिमें जितने निषेक होते हैं उतने मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिके साथ इन दोनों प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिके सन्निकर्ष विकल्प नहीं होते मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीवके सोलह कघायोंकी उत्कृष्ट स्थिति भी होती है और अनुत्कृष्ट स्थिति भी होती है यदि मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिका त्रन्ध करते समय सोलह कषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करता है तो उत्कृष्ट स्थिति होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट स्थिति होती है जो अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा कमसे कम एक समय और अधि हसे अधिक पल्यके असंख्यातवे मागप्रमाण कम होती है। स्त्रीवेद्‌, पुरुषवेद, हास्य और रतिकी नियमसे अनुत्कृष्ट स्थिति होती है, क्योंकि उस समय इनका बन्ध नहीं होता जो अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा कमसे कम अन्तमुहूत कम होती है और इस प्रकार उत्तरोत्तर कम होती हुई इनकी अनुत्कृष्ट स्थिति अन्तःकोड़ाकोड़ी प्रमाण तक पास हो सकती है। मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिके समथ शेष पाँच नोकषायोंकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती हे और अनुत्कृष्ट भी होती दै यदि उस समय सोलह कपायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध होकर एक आवलि कम उसका पाँच नोकघायोंमें संक्रमण हो रहा है तो उत्कृष्ट स्थिति होती दै, अन्यथा अनुक्कष्ट स्थिति होती है जो अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यका असंख्यातवां माग कम बीस कोड़ाकोड़ी सागर तक सम्भव है इस प्रकार मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिको प्रधान करके सन्निकर्षका विचार किया |

सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थितिवालेके मिथ्यात्वकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा अन्तमुहू तं कम होती है उस समय सम्यग्मिथ्यात्वकी स्थिति नियमसे उत्कृष्ट होती है कारण स्पष्ट हे सोलह कषाय और नो नोकषायोंकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा अन्तमुंहूतं कमसे लेकर पल्यके असंख्यातवें भागग्रमाण कम तक होती है सम्यग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके इसी प्रकार सन्निकर्ष विकल्प जानना चाहिए मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके पहले सन्निकर्ष कह आये है उसी प्रकार सोलह कषायोंको उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा सन्निकर्ष जानना चाहिए

ख्चीनेदकी उत्कृष्ट स्थितिवालेके मिथ्यात्वकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनो उत्कृष्ट की अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कम तक होती है सम्यक्त्व और सम्यग्मि-

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ध्यात्वकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्ट की अपेक्षा अन्तमुंहूर्त कमसे लेकर एक स्थिति तक होती हे मात्र इनकी अन्तिम जघन्य स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिको इन सन्निकर्ष विकल्पोंमेंसे कम कर देना चाहिए सोलह कषायोंकी नियमसे अनुत्कृष्ट स्थिति होती है जो अपनी उक्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर एक आवलि कम तक होती है.। पुरुषवेद्की स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होतो है जो अन्त- मुहूर्त कमसे लेकर अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर तक होती है। हास्य और रतिकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती हे ख्रीवेदके बन्धके समय हास्य और रतिका बन्ध होता है तो उत्कृष्ट होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट होती हे जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर तक होती है। अरति और शोककी स्थिति उत्कृष्ट मी होती हे और अनुत्कृ भी होती है खोवेंदके बन्धके समय इनका बन्भ होता है तो उत्कृष्ट होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यका असंख्यातवाँ मागकम बीस कोडाकोडी सागर तक होती है नपुंसकवेदको स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो एक समय कमसे लेकर पल्यका असंख्यातवाँ माग कम बीस कोडाकोडी सागर तक होती है मय और जुगुप्साकी स्थिति निमसे उत्कृष्ट होती है पुरुषवेदकी उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके इसी प्रकार सन्निकर्ष जानना चाहिए हास्य और रतिकी उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके भी इसी प्रकार सन्निकर्ष जानना चाहिए मात्र इसके स्त्रीवर और पुरुषवेदकी अनुत्कृष्ट स्थिति अपनी उत्कृष्ट स्थितिको अपेक्षा एक समय कम आदि होकर अन्तर्मुद्रृत आदि कम होती है। कारणकी जानकारीके लिए, पृष्ठ ४७३ देखो

नपुंसकवेदकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीवके मिथ्या वकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होतो है अनुत्कृष्ट स्थिति अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यके असंख्यातवें मागतक कम होती है सम्यकत्व और सम्यग्मिथ्यावत्की स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है, जो अन्तमुहूत कमसे लेकर एक स्थिति तक होती है सोलह कषायोंकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुक्कृष्ट भी होती है अनुत्कृष्ट स्थिति एक समय कमसे लेकर एक आवलि कम तक होती है स्रीवेद और पुरुधवेदकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा अन्तमुंहूर्त कमसे लेकर अन्त:कोड़ाकोड़ी सागर तक होती है हास्य और रतिकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती हे और अनुत्कृष्ट भी होती हे नो अपनी उत्कृश्की अपेक्षा एक समय कमसे लेकर अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर तक होती है। अरति और शोककी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। अनु- त्कृष्ट रिथति अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यका असंख्यातवाँ भागकम बीस कोड़ाकोड़ी सागर तक होतो है। भय और जुगुप्साकी स्थिति नियमसे उत्कृष्ट होती हे इसी प्रकार अरतिं, शोक, भय और जुगुप्साकी उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके सन्निकर्ष जानना चाहिए यहाँ जो विशेषता है उसे ४८३ पृष्ठसे जान लेनो चाहिए

मिथ्यात्वकी जघन्य स्थितिवालेके अनन्तानुबन्धीचतुष्कका सत्त्व नहीं होता, क्योंकि दश नमोहनीयकी क्षपणाके समय मिथ्यात्वकी जघन्य स्थिति होती है और अनन्तानुबन्धीकी इससे पूर्व विसंयोजना हो जाती है शेष कर्मों की स्थिति नियमसे अजघन्य असंख्यातगुणी अधिक होती है सम्यक वकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचारकी सत्ता नहीं होती शेष कर्मों की अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और अनन्तानुबन्धीचारकी सत्ता है भी और नहीं भी है | उद्बेळनाके समयसम्यग्मिथ्या वकी जघन्य स्थितिवाले जीवके सम्यक्खकी सत्ता नहीं है ` शेषकी है और क्षपणाके समय सम्यग्मिथ्या्की जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धोचारकी सत्ता नहीं होती, सम्यक्वकी होती है जब इनकी सत्ता होती है तो इनकी नियमसे अजघन्य असंख्यातगुणी होती है इन छह प्रकृतियोंके सिवा शेष प्रकृतियोंकी नियमसे अघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है

अनन्तानुबन्धो क्रोषको जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व आदि सब प्रकृतियोंकी नियमसे अजजधन्य असंख्यातरुणी स्थिति होती है मात्र अनन्तानुबन्धी मान आदि तीनकी जघन्य स्थिति होती है। इसी प्रकार

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अनन्तानुबन्धी मान आदि तीनकी जघन्य स्थिति की मुख्यतासे सन्निकष जानना चाहिए अप्रत्याख्यानावरण क्रोधकी जघन्य स्थितिवालेके चार संज्वकन और नो नोकषायोंकी नियमसे अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है। अप्रत्याख्यानावरण मान आदि तीन और प्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी नियमसे जघन्य स्थिति होती है | इसी प्रकार इन सात कषायोंकी जघन्य स्थितिकी मुख्यतासे सन्निकष जानना चाहिए |

स्रीवेदको जघन्य स्थितिवालेके सात नोकघाय और तीन संज्वलनोंकी नियमसे अजघन्य संख्यातगुणी स्थिति होती है और लोभसंज्बलनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है नपुंसकवेदकी जघन्य स्थितिवालेके इसी प्रकार सन्निकर्ष जानना चाहिए, पुरुषवेदकी जघन्य स्थितिवालेके तीन संज्वलनोंकी अजघन्य संख्यात-

` गुणी स्थिति होती है और लोभ संज्वलनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है |

हास्यकी जघन्य स्थितिवालेके तीन संज्वलन और पुरुषवेदकी अजघन्य संख्यातगुणी स्थिति होती है ओर लोभसंज्वळनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है। तथा पाँच नोकषायोकी जघन स्थिति होती है इसी प्रकार पाँच नोकषायोंकी जघन्य स्थितिकी मुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिए

क्रोधसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके दो संज्वलनकी अजघन्य संख्यातगुणी और लोमसंज्वलनकी अनघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है। मानसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके मायासंज्वलनकी अजघन्य संख्यातगुणी और लोमसंज्वलनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है मायासंज्वलनकी जघन्य स्थिति- वालेके लोभसंज्वळनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है छोमसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके अन्य प्रकृतियाँ नहीं होतीं

भाव--मूल और उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा सर्वत्र औदयिक भाव है

अल्पबहुत्व--सामान्यसे मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव थोडे हैं, क्योंकि उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्यास मिथ्यादृष्टि जीव करते हैं। इनसे अनुत्क्ष्ट स्थितिवाले अनन्तगुणे हे | कारण स्पष्ट है जघन्यकी अपेक्षा मोइनीयकी जघन्य स्थितिवाले समसे थोडे हैं, क्योंकि क्षपक सूक्ष्मसाम्परायिक जीवके अन्तिम समयमे मोइनोयकी जघन्य स्थिति होती है | इनसे अजघन्य स्थितिवाले जीव अनन्तगुणे हैं | उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा यहां स्थिति अल्पबहुत्वका विचार किया है जिसका ज्ञान अद्वाच्छेदसे हो सकता है, इसलिएयहांवह नहीं दिया जाता है

इस प्रकार कुल तेईस अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर स्थितिविभक्तिका विचार करके आगे भुजगार,

पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थितिसत्कर्मस्थान इन अधिकारोंका अवलम्बन लेकर विचार करके ॥स्थितिविभक्ति समाप्त होती है इन अविकारोंकी विशेष जानकारीके लिए मूलग्रन्थका स्वाध्याय करना आवश्यक है

विषय-सूची

भुजगार आदिके अर्थेपद कहनेकी प्रतिज्ञा

अर्थपद्‌ शब्दका अर्थ भुजगारविभक्तिका अर्थपद्‌ अल्पतरविभक्तिका अर्थपद्‌ अवस्थितविभक्तिका अर्थ पद अवक्तव्यविभक्तिका अथंपद्‌

भुजगारके १३ अनुयोगद्वार

समुत्कीतना

स्वामित्व

सिथ्यात्व

सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिथ्यात्व शेष कम

उच्चारणाके अनुसार स्वामित्व सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके

विषयमें दो उच्चारणाओंके मतोंका

निदेश एक जीवको अपेक्षा काळ सिथ्यास् सुजगारविभक्तिके चार समय भिन्न-भिन्न स्थितिबन्धके कारणभूत संझेशपरिणामोंका विचार स्थितिबन्धाष्यबसानस्थानोंके परिणमनकालका विचार सोळह कषाय और नो नोकषाय सोलह कषायोंके सुजगारके १९ समयाँका विचार नो नोकषायोंके सुजगारके १७ समयाँका विचार स्त्रीवेद आदिके अवस्थितका अन्तसुंहते काल कहाँ किस

१) SP SR

AY

३-१०५

४-५ ६-१४

§

७-९ ९-१८ १०-१४

१२-२३

१४-४२ | १४-२० |

१०

१६-१७

१७-१८ २०-२३

२०-२१

२१

प्रकार प्राप्त होता है इसका विचार २३-२३

)

अनन्तानुबन्धीके अवक्तव्यका